अनरथु अवध अरंभेउ जब तें
अनरथु अवध अरंभेउ जब तें
चौपाई ३, दोहा १५७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें॥ देखहिं राति भयानक सपना। जागि करहिं कटु कोटि कलपना॥ ३ ॥
अर्थ
जब से अयोध्या में अनर्थ प्रारम्भ हुआ, तभी से भरतजी को अपशकुन होने लगे। वे रात को भयानक स्वप्न देखते थे और जागने पर करोड़ों तरह की बुरी-बुरी कल्पनाएँ किया करते थे।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वशिष्ठ का भरत को बुलाने हेतु दूत भेजना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १५७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ के देहावसान के बाद वशिष्ठ द्वारा भरत और शत्रुघ्न को अयोध्या बुलाने हेतु दूत-प्रेषण का वर्णन है।
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वशिष्ठ का भरत को बुलाने हेतु दूत भेजना