तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं
छन्द ३, दोहा १०८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
छन्द पाठ
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं॥ स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा॥ ३ ॥
अर्थ
जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गम्भीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिर पर सुन्दर गंगा विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा और गले में सर्प सुशोभित हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रुद्राष्टक” प्रकरण का छन्द ३, दोहा १०८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भगवान शिव की महिमा, निराकारता और करुणा से परिपूर्ण पवित्र रुद्राष्टक स्तुति का वर्णन है।
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रुद्राष्टक