चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं
छन्द ४, दोहा १०८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
छन्द पाठ
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं॥ मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥ ४ ॥
अर्थ
जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुन्दर भ्रू और विशाल नेत्र हैं; जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं; सिंहचर्म का वस्त्र धारण किये और मुण्डमाला पहने हैं; उन सबके प्यारे और सबके नाथ [कल्याण करनेवाले] श्रीशंकरजी को मैं भजता हूँ।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रुद्राष्टक” प्रकरण का छन्द ४, दोहा १०८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भगवान शिव की महिमा, निराकारता और करुणा से परिपूर्ण पवित्र रुद्राष्टक स्तुति का वर्णन है।
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रुद्राष्टक