निराकारमोंकारमूलं तुरीयं
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं
छन्द २, दोहा १०८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
छन्द पाठ
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं॥ करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं॥ २ ॥
अर्थ
निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रुद्राष्टक” प्रकरण का छन्द २, दोहा १०८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भगवान शिव की महिमा, निराकारता और करुणा से परिपूर्ण पवित्र रुद्राष्टक स्तुति का वर्णन है।
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रुद्राष्टक