तेहिं कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध
तेहिं कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध
दोहा १०४ (ख) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
तेहिं कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेस। परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस॥ १०४ (ख) ॥
अर्थ
हे पक्षिराज! उस कलिकाल में मैं बहुत वर्षों तक अयोध्या में रहा। एक बार वहाँ अकाल पड़ा, तब मैं विपत्ति का मारा विदेश चला गया।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का दोहा १०४ (ख) है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा