गयउँ उजेनी सुनु उरगारी
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी
चौपाई १, दोहा १०५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी॥ गएँ काल कछु संपति पाई। तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई॥ १ ॥
अर्थ
हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सुनिये। मैं दीन, मलिन (उदास), दरिद्र और दुखी होकर उज्जैन गया। कुछ काल बीतने पर कुछ सम्पत्ति पाकर फिर मैं वहीं भगवान् शंकर की आराधना करने लगा।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १०५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा