श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत
श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत
दोहा १०० (ख) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक। तेहिं न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक॥ १०० (ख) ॥
अर्थ
वेदसम्मत तथा वैराग्य और ज्ञान से युक्त जो हरिभक्ति का मार्ग है, मोहवश मनुष्य उस पर नहीं चलते और अनेकों नये-नये पंथों की कल्पना करते हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का दोहा १०० (ख) है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा