भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब
भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब
दोहा १०० (क) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग। करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग॥ १०० (क) ॥
अर्थ
कलियुग में सब लोग वर्णसंकर और भिन्न-सेतु हो गये। वे पाप करते हैं और [उनके फलस्वरूप] दुःख, भय, रोग, शोक और [प्रिय वस्तु का] वियोग पाते हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का दोहा १०० (क) है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा