बहु दाम सँवारहिं धाम जती

छन्द १, दोहा १०१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

छन्द पाठ

बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती॥ तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही॥ १ ॥

अर्थ

संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। विषयों ने उनका वैराग्य हर लिया है। तपस्वी धनवान हो गये और गृहस्थ दरिद्र। हे तात! कलियुग की लीला कुछ कही नहीं जाती।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का छन्द १, दोहा १०१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।

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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा