सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा
सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा
चौपाई २, दोहा १०४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा। सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा॥ बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस। द्वापर धर्म हरष भय मानस॥ २ ॥
अर्थ
सत्त्वगुण अधिक हो, कुछ रजोगुण हो, कर्मों में प्रीति हो, सब प्रकार से सुख हो, यह त्रेता का धर्म है। रजोगुण बहुत हो, सत्त्वगुण बहुत ही थोड़ा हो, कुछ तमोगुण हो, मन में हर्ष और भय हो, यह द्वापर का धर्म है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १०४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा