नित जुग धर्म होहिं सब केरे
नित जुग धर्म होहिं सब केरे
चौपाई १, दोहा १०४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे॥ सुद्ध सत्व समता बिग्याना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना॥ १ ॥
अर्थ
श्रीरामजी की मायासे प्रेरित होकर सबके हृदयों में सभी युगों के धर्म नित्य होते रहते हैं। शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विज्ञान और मन का प्रसन्न होना, इसे सत्ययुग का प्रभाव जाने।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १०४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा