प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
छन्द ५, दोहा १०८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
छन्द पाठ
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं॥ त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं॥ ५ ॥
अर्थ
प्रचण्ड (रुद्ररूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशवाले, तीनों प्रकार के शूलों (दुःखों) को निर्मूल करनेवाले, हाथ में त्रिशूल धारण किये, भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होनेवाले भवानी के पति श्रीशंकरजी को मैं भजता हूँ।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रुद्राष्टक” प्रकरण का छन्द ५, दोहा १०८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भगवान शिव की महिमा, निराकारता और करुणा से परिपूर्ण पवित्र रुद्राष्टक स्तुति का वर्णन है।
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रुद्राष्टक