कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी
छन्द ६, दोहा १०८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
छन्द पाठ
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥ चिदानंद संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥ ६ ॥
अर्थ
कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्प का अन्त (प्रलय) करनेवाले, सज्जनों को सदा आनन्द देनेवाले, त्रिपुर के शत्रु, सच्चिदानन्दघन, मोह को हरनेवाले, मन को मथ डालनेवाले कामदेव के शत्रु, हे प्रभो! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रुद्राष्टक” प्रकरण का छन्द ६, दोहा १०८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भगवान शिव की महिमा, निराकारता और करुणा से परिपूर्ण पवित्र रुद्राष्टक स्तुति का वर्णन है।
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रुद्राष्टक