नमामीशमीशान निर्वाणरूपं

छन्द १, दोहा १०८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

छन्द पाठ

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं॥ १ ॥

अर्थ

हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर तथा सबके स्वामी श्रीशिवजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूप में स्थित (अर्थात्‌ मायादिरहित), [मायिक] गुणों से रहित, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाश को ही वस्त्ररूप में धारण करनेवाले दिगम्बर [अथवा आकाश को भी आच्छादित करनेवाले] आपको मैं भजता हूँ।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रुद्राष्टक” प्रकरण का छन्द १, दोहा १०८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भगवान शिव की महिमा, निराकारता और करुणा से परिपूर्ण पवित्र रुद्राष्टक स्तुति का वर्णन है।

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रुद्राष्टक