मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा

चौपाई २, दोहा ९८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥ मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई॥ २ ॥

अर्थ

जिसको जो अच्छा लग जाय, वही मार्ग है। जो डींग मारता है, वही पण्डित है। जो मिथ्या आरम्भ करता (आडम्बर रचता) है और जो दम्भ में रत है, उसी को सब कोई संत कहते हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ९८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।

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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा