बरन धर्म नहिं आश्रम चारी
बरन धर्म नहिं आश्रम चारी
चौपाई १, दोहा ९८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी॥ द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन॥ १ ॥
अर्थ
कलियुग में न वर्णधर्म रहता है, न चारों आश्रम रहते हैं। सब पुरुष-स्त्री वेद के विरोध में लगे रहते हैं। ब्राह्मण वेदों के बेचने वाले और राजा प्रजा सन् को खा डालने वाले होते हैं। वेद की आज्ञा कोई नहीं मानता।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा