कुलवंति निकारहिं नारि सती

छन्द २, दोहा १०१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

छन्द पाठ

कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनहिं चेरि निबेरि गती॥ सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं॥ २ ॥

अर्थ

कुलवती और सती स्त्री को घर से निकाल देते हैं और घर में दासी को ला रखते हैं। पुत्र अपने माता-पिता को तभी तक मानते हैं जब तक स्त्री का मुख नहीं दिखाई पड़ता।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का छन्द २, दोहा १०१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।

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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा