ससुरारि पिआरि लगी जब तें

छन्द ३, दोहा १०१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

छन्द पाठ

ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपुरूप कुटुंब भए तब तें॥ नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं॥ ३ ॥

अर्थ

जबसे ससुराल प्यारी लगने लगी, तबसे कुटुम्बी शत्रु रूप हो गये। राजा लोग पाप-परायण हो गये, उनमें धर्म नहीं रहा। वे प्रजा को नित्य ही दण्ड देकर उसकी विडम्बना किया करते हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का छन्द ३, दोहा १०१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।

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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा