न यावद् उमानाथ पादारविन्दं

छन्द ७, दोहा १०८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

छन्द पाठ

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं। भजंतीह लोके परे वा नराणां॥ न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥ ७ ॥

अर्थ

जब तक पार्वती के पति आपके चरणकमलों को मनुष्य नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इहलोक और परलोक में सुख-शान्ति मिलती है और न उनके तापों का नाश होता है। अतः हे समस्त जीवों के अंदर (हृदय में) निवास करनेवाले प्रभो! प्रसन्न होइये।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रुद्राष्टक” प्रकरण का छन्द ७, दोहा १०८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भगवान शिव की महिमा, निराकारता और करुणा से परिपूर्ण पवित्र रुद्राष्टक स्तुति का वर्णन है।

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रुद्राष्टक