काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही

चौपाई ४, दोहा १०४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही॥ नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया॥ ४ ॥

अर्थ

जिसका श्रीरघुनाथजी के चरणों में अत्यन्त प्रेम है, उसको कालधर्म (युगधर्म) नहीं व्यापते। हे पक्षिराज! नट (बाजीगर) का किया हुआ कपट-चरित्र (इन्द्रजाल) देखने वालों के लिये बड़ा विकट (दुर्गम) होता है, पर नट के सेवक को उसकी माया नहीं व्यापती।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १०४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।

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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा