बिप्र एक बैदिक सिव पूजा
बिप्र एक बैदिक सिव पूजा
चौपाई २, दोहा १०५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
बिप्र एक बैदिक सिव पूजा। करइ सदा तेहि काजु न दूजा॥ परम साधु परमारथ बिंदक। संभु उपासक नहिं हरि निंदक॥ २ ॥
अर्थ
एक ब्राह्मण वैदिक विधि से सदा शिवजी की पूजा करते, उन्हें दूसरा कोई काम न था। वे परम साधु और परमार्थ के ज्ञाता थे, वे शम्भु के उपासक थे, पर श्रीहरि की निन्दा करने वाले न थे।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १०५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा