तेहि सेवउँ मैं कपट समेता
तेहि सेवउँ मैं कपट समेता
चौपाई ३, दोहा १०५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
तेहि सेवउँ मैं कपट समेता। द्विज दयाल अति नीति निकेता॥ बाहिज नम्र देखि मोहि साईं। बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं॥ ३ ॥
अर्थ
मैं कपटपूर्वक उनकी सेवा करता। ब्राह्मण बड़े ही दयालु और नीति के घर थे। हे स्वामी! बाहर से नम्र देखकर ब्राह्मण मुझे पुत्र की भाँति मानकर पढ़ाते थे।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १०५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा