एहिं सर मम उत्तर तट बासी
एहिं सर मम उत्तर तट बासी
चौपाई ३, दोहा ६० के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
एहिं सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥ सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥ ३ ॥
अर्थ
इस बाण से मेरे उत्तर तट पर रहनेवाले पाप की राशि दुष्ट मनुष्यों का वध कीजिये। कृपालु और रणधीर श्रीरामजी ने समुद्र के मन की पीड़ा सुनकर उसे तुरंत ही हर लिया (अर्थात् बाण से उन दुष्टों का वध कर दिया)।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “राम का क्रोध, समुद्र की विनती” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ६० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के धर्मसम्मत क्रोध और भयभीत समुद्र की विनम्र प्रार्थना एवं मार्गदर्शन का वर्णन है।
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राम का क्रोध, समुद्र की विनती