अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
श्लोक ३ · सुन्दरकाण्ड
श्लोक पाठ
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ ३ ॥
अर्थ
अतुल बल के धाम, सोने के पर्वत (सुमेरु) के समान कान्तियुक्त शरीरवाले, दैत्यरूपी वन [को ध्वंस करने] के लिये अग्निरूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्रीरघुनाथजी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्रीहनुमानजी को मैं प्रणाम करता हूँ।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “मंगलाचरण” प्रकरण का श्लोक ३ है। इस प्रकरण में सुन्दरकाण्ड के आरंभ में श्रीराम और हनुमानजी की स्तुति व भक्ति-समर्पण का वर्णन है।
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मंगलाचरण