नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
श्लोक २ · सुन्दरकाण्ड
श्लोक पाठ
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा। भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥ २ ॥
अर्थ
हे रघुनाथजी ! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सबके अन्तरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं) कि मेरे हृदय में दूसरी कोई इच्छा नहीं है। हे रघुकुलकश्रेष्ठ ! मुझे अपनी निर्भरां (पूर्ण) भक्ति दीजिये और मेरे मन को काम आदि दोषों से रहित कीजिये।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “मंगलाचरण” प्रकरण का श्लोक २ है। इस प्रकरण में सुन्दरकाण्ड के आरंभ में श्रीराम और हनुमानजी की स्तुति व भक्ति-समर्पण का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
मंगलाचरण