अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा

चौपाई ३, दोहा ५८ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥ संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥ ३ ॥

अर्थ

ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी ने धनुष चढ़ाया। यह मत लक्ष्मणजी के मन को बहुत अच्छा लगा। प्रभु ने भयानक [अग्नि] बाण सन्धान किया, जिससे समुद्र के हृदय के अंदर अग्नि की ज्वाला उठी।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “राम का क्रोध, समुद्र की विनती” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ५८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के धर्मसम्मत क्रोध और भयभीत समुद्र की विनम्र प्रार्थना एवं मार्गदर्शन का वर्णन है।

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राम का क्रोध, समुद्र की विनती