मकर उरग झष गन अकुलाने

चौपाई ४, दोहा ५८ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥ कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥ ४ ॥

अर्थ

मगर, साँप तथा मछलियों के समूह व्याकुल हो गये। जब समुद्र ने जीवों को जलते जाना, तब सोने के थाल में अनेक मणियों (रत्नों) को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मण के रूप में आया।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “राम का क्रोध, समुद्र की विनती” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ५८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के धर्मसम्मत क्रोध और भयभीत समुद्र की विनम्र प्रार्थना एवं मार्गदर्शन का वर्णन है।

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राम का क्रोध, समुद्र की विनती