आइ बिभीषन पुनि सिरु नायो

चौपाई १-२, दोहा १०६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

आइ बिभीषन पुनि सिरु नायो। कृपासिंधु तब अनुज बोलायो॥ तुम्ह कपीस अंगद नल नीला। जामवंत मारुति नयसीला॥ सब मिलि जाहु बिभीषन साथा। सारेहु तिलक कहेउ रघुनाथा॥ पिता बचन मैं नगर न आवउँ। आपु सरिस कपि अनुज पठावउँ॥ १-२ ॥

अर्थ

सब क्रिया-कर्म करने के बाद विभीषण ने आकर पुनः सिर नवाया। तब कृपा के समुद्र श्रीरामजी ने छोटे भाई लक्ष्मणजी को बुलाया। श्रीरघुनाथजी ने कहा कि तुम, कपीस, अंगद, नल, नील, जामवंत और मारुति सब मिलकर विभीषण के साथ जाओ और उन्हें राजतिलक कर दो। पिताजी के वचनों के कारण मैं नगर में नहीं आ सकता। अपने ही समान वानर और छोटे भाई को भेजता हूँ।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “विभीषण का राज्याभिषेक” प्रकरण का चौपाई १-२, दोहा १०६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राम की आज्ञा से विभीषण का लंका के राजा के रूप में राजतिलक एवं धर्म-स्थापना का वर्णन है।

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विभीषण का राज्याभिषेक