उघरहिं बिमल बिलोचन ही के
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के
चौपाई ४, दोहा १ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के॥ सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक॥ ४ ॥
अर्थ
उसके हृदयमें आते ही हृदयके निर्मल नेत्र खुल जाते हैं और संसाररूपी रात्रिके दोष-दुःख मिट जाते हैं एवं श्रीरामचरित्ररूपी मणि और माणिक्य, गुप्त और प्रकट जहाँ जो जिस खानमें है, सब दिखायी पड़ने लगते हैं--।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “गुरु वन्दना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु-चरण-वन्दना और उनकी कृपा से अज्ञान-नाश तथा रामकथा-बोध का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
गुरु वन्दना