श्रीगुर पद नख मनि गन जोती
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती
चौपाई ३, दोहा १ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥ दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥ ३ ॥
अर्थ
श्रीगुरु महाराजके चरण-नखोंकी ज्योति मणियोंके प्रकाशके समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदयमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश करनेवाला है; वह जिसके हृदयमें आ जाता है, उसके बड़े भाग्य हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “गुरु वन्दना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु-चरण-वन्दना और उनकी कृपा से अज्ञान-नाश तथा रामकथा-बोध का वर्णन है।
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गुरु वन्दना