सुकृति संभु तन बिमल बिभूती
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती
चौपाई २, दोहा १ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥ जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥ २ ॥
अर्थ
वह रज सुकृती (पुण्यवान् पुरुष) रूपी शिवजीके शरीरपर सुशोभित निर्मल विभूति है और सुन्दर कल्याण और आनन्दकी जननी है, भक्तके मनरूपी सुन्दर दर्पणके मैलको दूर करनेवाली और तिलक करनेसे गुणोंके समूहको वशमें करनेवाली है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “गुरु वन्दना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु-चरण-वन्दना और उनकी कृपा से अज्ञान-नाश तथा रामकथा-बोध का वर्णन है।
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गुरु वन्दना