बंदउँ गुरु पद पदुम परागा

चौपाई १, दोहा १ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥ अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥ १ ॥

अर्थ

मैं गुरु महाराजकं चरणकमलोंकी रजकी वन्दना करता हूँ, जो सुरुचि (सुन्दर स्वाद), सुगन्ध तथा अनुरागरूपी रससे पूर्ण है। वह अमृतमय मूल (सञ्जीवनी जड़ी)का सुन्दर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भव-रोगोंके परिवारको नाश करनेवाला है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “गुरु वन्दना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु-चरण-वन्दना और उनकी कृपा से अज्ञान-नाश तथा रामकथा-बोध का वर्णन है।

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गुरु वन्दना