निज कबित्त केहि लाग न नीका
निज कबित्त केहि लाग न नीका
चौपाई ६, दोहा ८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
निज कबित्त केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका॥ जे पर भनिति सुनत हरषाहीं। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं॥ ६ ॥
अर्थ
रसीली हो या अत्यन्त फीकी, अपनी कविता किसे अच्छी नहीं लगती? किन्तु जो दूसरे की रचना को सुनकर हर्षित होते हैं, ऐसे उत्तम पुरुष जगत् में बहुत नहीं हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जीवों में रामरूप वन्दना” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा ८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में समस्त चौरासी लाख योनियों में सीताराममय जगत् देखकर कवि की सर्वजीव वन्दना का वर्णन है।
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जीवों में रामरूप वन्दना