जग बहु नर सर सरि सम
जग बहु नर सर सरि सम
चौपाई ७, दोहा ८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जग बहु नर सर सरि सम भाई। जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई॥ सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई॥ ७ ॥
अर्थ
हे भाई। जगत् में तालाबों और नदियों के समान मनुष्य ही अधिक हैं, जो जल पाकर अपनी ही बाढ़ से बढ़ते हैं (अर्थात् अपनी ही उन्नति से प्रसन्न होते हैं)। समुद्र-सा तो कोई एक विरला ही सज्जन होता है जो चन्द्रमा को पूर्ण देखकर (दूसरों का उत्कर्ष देखकर) उमड़ पड़ता है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जीवों में रामरूप वन्दना” प्रकरण का चौपाई ७, दोहा ८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में समस्त चौरासी लाख योनियों में सीताराममय जगत् देखकर कवि की सर्वजीव वन्दना का वर्णन है।
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जीवों में रामरूप वन्दना