मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल

छन्द ३, दोहा २११ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना। देखेउँ भरि लोचन हरि भवमोचन इहइ लाभ संकर जाना॥ बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना। पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना॥ ३ ॥

अर्थ

मुनि ने जो मुझे शाप दिया, सो बहुत ही अच्छा किया। मैं उसे अत्यन्त अनुग्रह मानती हूँ कि जिसके कारण मैंने संसार से छुड़ानेवाले श्रीहरि (आप) को नेत्र भरकर देखा। इसी (आपके दर्शन) को शंकरजी सबसे बड़ा लाभ समझते हैं। हे प्रभो! मैं बुद्धि की बड़ी भोली हूँ, मेरी एक विनती है। हे नाथ! मैं और कोई वर नहीं माँगती, केवल यही चाहती हूँ कि मेरा मनरूपी भौंरा आपके चरणकमल की रज के प्रेमरूपी रस का सदा पान करता रहे।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “अहल्या उद्धार” प्रकरण का छन्द ३, दोहा २११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के चरणस्पर्श से अहल्या के शापमुक्ति और उनकी भावपूर्ण स्तुति का वर्णन है।

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अहल्या उद्धार