जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट
जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट
छन्द ४, दोहा २११ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी। सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी॥ एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी। जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पतिलोक अनंद भरी॥ ४ ॥
अर्थ
जिन चरणों से परमपवित्र देवनदी गंगा प्रकट हुई, जिन्हें शिवजी ने सिर पर धारण किया और जिन चरणकमलों को ब्रह्माजी पूजते हैं, कृपालु हरि (आप) ने उन्हीं को मेरे सिर पर रखा। इस प्रकार [स्तुति करती हुई] बार-बार भगवान् के चरणों में गिरकर, जो मन को बहुत ही अच्छा लगा, उस वर को पाकर गौतम की स्त्री अहल्या आनन्द में भरी हुई पति-लोक चली गयी।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “अहल्या उद्धार” प्रकरण का छन्द ४, दोहा २११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के चरणस्पर्श से अहल्या के शापमुक्ति और उनकी भावपूर्ण स्तुति का वर्णन है।
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अहल्या उद्धार