धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा
छन्द २, दोहा २११ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई। अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई॥ मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई। राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई॥ २ ॥
अर्थ
फिर उसने मन में धीरज धरकर प्रभु को पहचाना और श्रीरघुनाथजी की कृपा से भक्ति प्राप्त की। तब अत्यन्त निर्मल वाणी से उसने [इस प्रकार] स्तुति की— हे ज्ञान से जानने योग्य श्रीरघुराई! आपकी जय हो! मैं [सहज ही] अपवित्र स्त्री हूँ; और हे प्रभो! आप जगत् को पवित्र करने वाले, रावण के शत्रु और भक्तों को सुख देने वाले हैं। हे राजीवबिलोचन! हे संसार (जन्म-मृत्यु) के भय से छुड़ाने वाले! मैं आपकी शरण आयी हूँ, [मेरी] रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “अहल्या उद्धार” प्रकरण का छन्द २, दोहा २११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के चरणस्पर्श से अहल्या के शापमुक्ति और उनकी भावपूर्ण स्तुति का वर्णन है।