मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी
मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी
चौपाई ४, दोहा ८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी॥ छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई॥ ४ ॥
अर्थ
मेरी बुद्धि तो अत्यन्त नीची है और चाह बड़ी ऊँची है; चाह तो अमृत पाने की है, पर जगत् में जुड़ती छाछ भी नहीं। सज्जन मेरी ढिठाई को क्षमा करेंगे और मेरे बालवचनों को मन लगाकर (प्रेमपूर्वक) सुनेंगे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जीवों में रामरूप वन्दना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में समस्त चौरासी लाख योनियों में सीताराममय जगत् देखकर कवि की सर्वजीव वन्दना का वर्णन है।
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जीवों में रामरूप वन्दना