करन चहउँ रघुपति गुन गाहा

चौपाई ३, दोहा ८ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा॥ सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ॥ ३ ॥

अर्थ

मैं श्रीरघुनाथजी के गुणों का वर्णन करना चाहता हूँ, परन्तु मेरी बुद्धि छोटी है और श्रीरामजी का चरित्र अथाह है। इसके लिए मुझे उपाय का एक भी अंग अर्थात् कुछ (लेशमात्र) भी उपाय नहीं सूझता। मेरे मन और बुद्धि कंगाल हैं, किन्तु मनोरथ राजा है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जीवों में रामरूप वन्दना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में समस्त चौरासी लाख योनियों में सीताराममय जगत् देखकर कवि की सर्वजीव वन्दना का वर्णन है।

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जीवों में रामरूप वन्दना