कह सिव जदपि उचित अस नाहीं
कह सिव जदपि उचित अस नाहीं
चौपाई १, दोहा ७७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं॥ सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा॥ १ ॥
अर्थ
शिवजी ने कहा--यद्यपि ऐसा उचित नहीं है, परन्तु स्वामी की बात भी मेटी नहीं जा सकती। हे नाथ! मेरा यही परम धर्म है कि मैं आपकी आज्ञा को सिर पर रखकर उसका पालन करूँ।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “राम का शिवजी से विवाह-अनुरोध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ७७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा शिवजी को पार्वती से विवाह करने के अनुरोध और शिवजी की सहर्ष स्वीकृति का वर्णन है।
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राम का शिवजी से विवाह-अनुरोध