परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट

छन्द १, दोहा २११ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही। देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥ अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही। अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥ १ ॥

अर्थ

श्रीरामजी के पवित्र और शोक को नाश करने वाले चरणों का स्पर्श पाते ही सचमुच वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गयी। भक्तों को सुख देने वाले श्रीरघुनाथजी को देखकर वह हाथ जोड़कर सामने खड़ी रह गयी। अत्यन्त प्रेम के कारण वह अधीर हो गयी। उसका शरीर पुलकित हो उठा; मुख से वचन कहने में नहीं आते थे। वह अत्यन्त बड़भागिनी अहल्या प्रभु के चरणों से लिपट गयी और उसके दोनों नेत्रों से जल (प्रेम और आनन्द के आँसुओं) की धारा बहने लगी।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “अहल्या उद्धार” प्रकरण का छन्द १, दोहा २११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के चरणस्पर्श से अहल्या के शापमुक्ति और उनकी भावपूर्ण स्तुति का वर्णन है।

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अहल्या उद्धार