बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु

सोरठा ५ · बालकाण्ड

सोरठा पाठ

बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥ ५ ॥

अर्थ

मैं उन गुरु महाराजके चरणकमलकी वन्दना करता हूँ, जो कृपाके समुद्र और नररूपमें श्रीहरि ही हैं और जिनके वचन महामोहरूपी घने अन्धकारके नाश करनेके लिये सूर्यकिरणोंके समूह हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “मंगलाचरण” प्रकरण का सोरठा ५ है। इस प्रकरण में तुलसीदास द्वारा सरस्वती, गणेश, भवानी-शंकर, गुरु और श्रीराम की वंदना एवं दिव्य कृपा की याचना का वर्णन है।

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मंगलाचरण