मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं
मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं
चौपाई २, दोहा १२६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं॥ मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू॥ २ ॥
अर्थ
क्योंकि जिनसे मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे राजा बिना अग्नि के ही (अपने दुष्ट कर्मों से ही) जलकर भस्म हो जाते हैं। ब्राह्मणों का संतोष सब मङ्गलों की जड़ है और भूदेव ब्राह्मणों का क्रोध करोड़ों कुलों को भस्म कर देता है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १२६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम और महर्षि वाल्मीकि का मिलन तथा प्रभु के सच्चे निवास का आध्यात्मिक उपदेश का वर्णन है।
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श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद