चित्रकूट गिरि करहु निवासू
चित्रकूट गिरि करहु निवासू
चौपाई २, दोहा १३२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू॥ सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू॥ २ ॥
अर्थ
आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिये, वहाँ आपके लिये सब प्रकार की सुविधा है। सुहावना पर्वत है और सुन्दर वन है। वह हाथी, सिंह, हिरन और पक्षियों का विहारस्थल है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम और महर्षि वाल्मीकि का मिलन तथा प्रभु के सच्चे निवास का आध्यात्मिक उपदेश का वर्णन है।
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श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद