बालमीकि मन आनँदु भारी
बालमीकि मन आनँदु भारी
चौपाई ३, दोहा १२५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी॥ तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई॥ ३ ॥
अर्थ
[मुनि श्रीरामजी के पास बैठे हैं और उनकी] मंगल-मूर्ति को नेत्रों से देखकर वाल्मीकिजी के मन में बड़ा भारी आनन्द हो रहा है। तब श्रीरघुनाथजी कमलसदृश हाथों को जोड़कर, कानों को सुख देने वाले मधुर वचन बोले--।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १२५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम और महर्षि वाल्मीकि का मिलन तथा प्रभु के सच्चे निवास का आध्यात्मिक उपदेश का वर्णन है।
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श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद