उदासीन नित रहिअ गोसाईं
उदासीन नित रहिअ गोसाईं
चौपाई ८, दोहा १०६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
उदासीन नित रहिअ गोसाईं। खल परिहरिअ स्वान की नाईं॥ मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई। गुर हित कहइ न मोहि सोहाई॥ ८ ॥
अर्थ
हे गोसाईं! उससे तो सदा उदासीन ही रहना चाहिये। दुष्ट को कुत्ते की तरह दूर से ही त्याग देना चाहिये। मैं दुष्ट था, हृदय में कपट और कुटिलता भरी थी। [इसीलिए यद्यपि] गुरुजी हित की बात कहते थे, पर मुझे वह सुहाती न थी।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का चौपाई ८, दोहा १०६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा