तामस धर्म करहिं नर जप तप

दोहा १०१ (ख) · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

तामस धर्म करहिं नर जप तप ब्रत मख दान। देव न बरषहिं धरनीं बए न जामहिं धान॥ १०१ (ख) ॥

अर्थ

मनुष्य जप, तप, व्रत, यज्ञ और दान आदि धर्म तामसी भाव से करने लगे। देवता (इन्द्र) पृथ्वी पर जल नहीं बरसाते और बोया हुआ अन्न उगता नहीं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का दोहा १०१ (ख) है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।

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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा