सोइ भव तर कछु संसय नाहीं
सोइ भव तर कछु संसय नाहीं
चौपाई ४, दोहा १०३ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
सोइ भव तर कछु संसय नाहीं। नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं॥ कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा॥ ४ ॥
अर्थ
वही भवसागर से तर जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं। नाम का प्रताप कलियुग में प्रत्यक्ष है। कलियुग का एक पवित्र प्रताप (महिमा) है कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर [मानसिक] पाप नहीं होते।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १०३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा