रामहि भजहिं तात सिव धाता
रामहि भजहिं तात सिव धाता
चौपाई २, दोहा १०६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पावँर कै केतिक बाता॥ जासु चरन अज सिव अनुरागी। तासु द्रोहँ सुख चहसि अभागी॥ २ ॥
अर्थ
है तात! शिवजी और ब्रह्माजी भी श्रीरामजी को भजते हैं [फिर] नीच मनुष्य की तो बात ही कितनी है ? ब्रह्माजी और शिवजी जिनके चरणों के प्रेमी हैं, अरे अभागे! उनसे द्रोह करके तू सुख चाहता है ?
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १०६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा