कबि बृंद उदार दुनी न सुनी
कबि बृंद उदार दुनी न सुनी
छन्द ५, दोहा १०१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
छन्द पाठ
कबि बृंद उदार दुनी न सुनी। गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी॥ कलि बारहिं बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै॥ ५ ॥
अर्थ
कवियों के तो झुंड हो गये, पर दुनिया में उदार आश्रयदाता सुनायी नहीं पड़ता। गुण-दोष बताने वाले बहुत हैं, पर गुणी कोई भी नहीं है। कलियुग में बार-बार अकाल पड़ते हैं; अन्न के बिना सब लोग दुखी होकर मरते हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का छन्द ५, दोहा १०१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा